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अटल

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अटल काल के कपाल पर, जो लिखता, मिटाता था। मौत से लड़ने का, हुनर उसे आता था। बातें उसकी अंदाज निराला, सबके मन को भाता था भारत रत्न, सिरमौर वह, अटल नाम कहलाता था। पंचतत्त्व से बना शरीर ये, पंचतत्त्व मे मिल जाएगा। अटल सत्य है, अटल बात, अटल नाम रह जाएगा। दृढ़ - विचार और दृढ़ - शक्ति का, पाठ पढ़ा जब जाएगा। मन - मस्तिष्क के अंतरिक्ष में, बस याद अटल ही आएगा। राजनीति को काव्य - धारा में, वह बहा ले जाता था। अंतर्मन से, चितवन - चित, सबको चित कर जाता था। शून्य से उठाकर राजनीति को, जो शिखर तक लाता था। भारत - रत्न, सिरमौर वह, अटल नाम कहलाता था। अटल नाम कहलाता था... रचयिता डॉ0 ललित कुमार, प्रधानाध्यापक, प्राथमिक विद्यालय खिजरपुर जोशीया,  विकास खण्ड-लोधा,  जनपद-अलीगढ़।

नाम अटल कहलाता था

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नाम अटल कहलाता था देवतुल्य वह व्यक्ति हमेशा; भारत के गुण गाता था। अटल वचन था अटल शख्सियत; नाम अटल कहलाता था।। पिता एक अध्यापक थे पर; कवि हृदय भी पाया था। साहित्यिक गुण भी तो शायद; सुनो वहीं से आया था। पढ़ना और पढ़ाना ही बस; उनके मन को भाता था। अटल वचन था, अटल शख्सियत; नाम अटल कहलाता था।। प्रखर बुद्धि, ओजस्वी वक्ता; शिक्षा-दीक्षा खूब हुई। आजीवन अविवाहित थे वो; देशभक्ति महबूब हुई।। मातृभूमि पर मर मिटना था; उससे ही बस नाता था। अटल वचन था अटल शख्सियत; नाम अटल कहलाता था।। मुखिया बने देश के जब-जब; मातृभूमि का हित साधा। सिंह गर्जना करते थे जब; मिट जाती थी सब बाधा।। किया यहाँ परमाणु परीक्षण; जग उनसे थर्राता था। अटल वचन था, अटल शख्सियत; नाम अटल कहलाता था।। चार दशक ओजस्वी वाणी; इस संसद में गूँजी थी। सरल हृदय मन में सच्चाई; बस ये उनकी पूँजी थी।। बच्चों जैसा मन था उनका; केवल सत्य सुहाता था। अटल वचन था, अटल शख्सियत; नाम अटल कहलाता था।। चले गये वो हमें छोड़कर; मार्ग सत्य का दिखलाकर। स्वाभिमान से जिएँ किस तरह, सबक अनोखा सिखलाकर।। जी भरकर वे जिये उम...

सूर्यग्रहण

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सूर्यग्रहण मम्मी ने पापा से बोला, कल पड़ेगा सूर्य - ग्रहण। मन मेरा तो कौंध गया था, अभी पड़ा था चन्द्र ग्रहण। पूछा जब मैंने मम्मी से, क्या होता है सूर्यग्रहण। डपट दिया मम्मी ने, ये कहकर, जाओ पापा की शरण। क्या होता है सूर्यग्रहण, जब पूछा मैंने पापा से। पापा ने भी टाल दिया, और बोले पूछो टीचर से। टीचर जी से पूछा, जब मैंने हौले, वह मन ही मन मुस्काकर बोले। बच्चों तुमको नहीं हैं फँसना, ये तो है विज्ञान की घटना। पृथ्वी घूमी, चंदा घूमा, पर न घूमा सूरज। इसी बात का झगड़ा बच्चों, मन में रखो तुम धीरज। घूम, घूमकर आते जब ये, तीनों एक दिशा पर। तब छाया पड़ती चंदा की, अपनी प्यारी वसुधा पर। पृथ्वी के जिस भाग में बच्चों, चंदा की छाया आयी. पृथ्वी के उस भाग से सूरज, देता नहीं दिखायी। प्यारे बच्चों बात पते की अब तुम इसे समझ लो। सूर्यग्रहण पड़ता कैसे है, मन-मस्तिष्क में भर लो। मन - मस्तिष्क में भर लो। रचयिता डॉ0 ललित कुमार, प्रधानाध्यापक, प्राथमिक विद्यालय खिजरपुर जोशीया,  विकास खण्ड-लोधा,  जनपद-अलीगढ़।

संयुक्त परिवार

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संयुक्त परिवार कितने सुन्दर कितने प्यारे, संस्कार वहाँ पर मिलते थे। दृश्य मनोरम होता था जब, साझे चूल्हे जलते थे।। चाचा-ताऊ, बुआ-भतीजा, और न जाने कितने रिश्ते। हमको तब लगता था मानो, मिले हमें अनगिनत फरिश्ते।। साझे परिवारों का चलन था, स्वार्थ वहाँ कम मिलते थे। दृश्य मनोरम होता था जब, साझे चूल्हे जलते थे।। बड़े-बुजुर्गों के हाथों में, अनुशासन की डोर थी। सबको मजबूती से बाँधे, कड़ी नहीं कमजोर थी। घर का मुखिया सर्वमान्य था, रोज देव कब गढ़ते थे। दृश्य मनोरम होता था जब, साझे चूल्हे जलते थे।। दादी का तब लाड़ बहुत था, हम बाबा के प्यारे थे। दूध, दही की नदियाँ बहती, खेल-खिलौने न्यारे थे।। टीवी वीडियो गेम नहीं थे, खेल कबड्डी चलते थे। दृश्य मनोरम होता था जब, साझे चूल्हे जलते थे।। रोजगार की खातिर सब, अपनों से कितने दूर हुए। भूल चुके अपनापन मानो, दिल में नये फितूर हुए।। एकाकी परिवार हुए जो, साझे सपने बुनते थे। दृश्य मनोरम होता था जब, साझे चूल्हे जलते थे।। साथ नहीं रह सकते यदि हम, कुछ नैतिक माहौल बनाएँ। घर के बड़े बुजुर्गों का हम, बच्चों से सम्मान कराएँ।...

एक वीर-परमवीर

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एक वीर-परमवीर सूर्य का प्रकाश हुआ गहरा, सागर का भी जल है ठहरा। कर्मवीर के भाग्य को देख, रो पडे आकाश के मेघ। छलनी है आज उसका शरीर, फिर भी देखो अडिग है शूरवीर। शान से देखो बढ चला, करने राष्ट्र का भला। दुश्मनों के तीर न हुए खत्म, टूट गये खुशियों के भ्रम। हाथ लिए तिरंगा, धरती की गोद में वह सोता है, ऐसे वीर को खोकर धरती माँ का दिल रोता है। रचयिता सुमन शर्मा, इं. प्रधनाध्यापक पूर्व माध्यमिक विद्यालय मांकरौल, विकास खण्ड - इगलास, जनपद - अलीगढ़।

नये साल में

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नये साल में होली  गयी, दीवाली  गयी,                              त्योहारों की बहार गयी, सभी त्यौहारों का फिर से हैं इंतजार,       ।। नये साल में ।। ये करना है, वो करना है, मन का मन में नहीं रखना है, मुट्ठी में भर लू पूरा संसार,       ।। नये साल में ।। कोई असहाय भूखा न सोये, कोई बच्चा  माँ  को  न रोये, कोई निर्दोष न खाए आतंक की मार,      ।। नये साल में ।। भारत का मान बढ़ाएँगे, बुराइयों को दूर भगाएँगे सब तरफ होगा प्यार ही प्यार,     ।। नये साल में ।। हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई, आपस में है भाई-भाई, ये कहावत करेंगे साकार,       ।। नये साल में ।। रचयिता हेमलता गुप्ता, सहायक अध्यापक, प्राथमिक विद्यालय मुकंदपुर, विकास खण्ड-लोधा,  जनपद-अलीगढ़।

जीवन हो उत्कर्ष

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जीवन हो उत्कर्ष बीत गया वर्ष उन्नीस, और य‍ह निकला निष्कर्ष मधुर वचन से होत सब, और बिगारै बोल कर्कश। हो जाए समरसता सब में, करें विचार विमर्श। क्षम्य हों त्रुटियाँ सभी, जो हो गयी बीते वर्ष। नव संचार हो जाये तन में, और जीवन हो उत्कर्ष। दूर हो अमंगल सबके, और मंगलमय हो 2020 नूतन वर्ष। रचयिता डॉ0 ललित कुमार, प्रधानाध्यापक, प्राथमिक विद्यालय खिजरपुर जोशीया,  विकास खण्ड-लोधा,  जनपद-अलीगढ़।